नौणी: डॉ. यशवंत सिंह परमार औद्यानिकी एवं वानिकी विश्वविद्यालय, नौणी ने अपने अनुसंधान एवं विस्तार गतिविधियों को और अधिक सुदृढ़ करने के लिए एक व्यापक रोडमैप तैयार किया है। इसमें जलवायु-सक्षम बागवानी, किसान-केंद्रित तकनीकों, फसल विविधीकरण, उद्योग-शैक्षणिक सहयोग, डिजिटल विस्तार, नवाचार, पेटेंट तथा राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अनुसंधान की दृश्यता बढ़ाने पर विशेष जोर दिया गया है।
इस रोडमैप पर विश्वविद्यालय की 28वीं अनुसंधान परिषद एवं 26वीं विस्तार परिषद की बैठकों में चर्चा की गई, जिसकी अध्यक्षता कुलपति प्रो. हरमिंदर सिंह बवेजा ने की। बैठकों में कृषि, बागवानी एवं वन विभागों के वरिष्ठ अधिकारियों, प्रगतिशील किसानों, विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों, विभागाध्यक्षों, अनुसंधान केंद्रों, कृषि विज्ञान केंद्रों तथा अन्य हितधारकों ने भाग लिया।
परिषदों की बैठकों में पिछले वर्ष के दौरान विश्वविद्यालय द्वारा किए गए कार्यों की समीक्षा की गई तथा आगामी वर्षों के लिए प्राथमिकताओं पर विचार-विमर्श किया गया। चर्चा में हिमाचल प्रदेश के कृषि, बागवानी, वानिकी एवं संबद्ध क्षेत्रों के समक्ष उभर रही चुनौतियों पर विशेष ध्यान दिया गया। सदस्यों ने विश्वविद्यालय के विस्तार नेटवर्क के माध्यम से प्रदेश एवं केंद्र सरकार की विभिन्न योजनाओं एवं कार्यक्रमों की जानकारी किसानों तक प्रभावी ढंग से पहुंचाने पर भी चर्चा की। लहसुन की खेती, प्रसंस्करण एवं निर्यात तथा ‘वेस्ट टू वेल्थ’ पहलों की संभावनाओं पर भी विचार किया गया और इनके लिए अनुसंधान एवं मूल्य संवर्धन को बढ़ावा देने पर जोर दिया गया।
निदेशक विस्तार डॉ. डी.पी. शर्मा ने परिषद को अवगत करवाया कि विश्वविद्यालय ने पिछले 10 महीनों के दौरान 33,000 से अधिक किसानों तक ऑन-कैंपस एवं ऑफ-कैंपस प्रशिक्षण कार्यक्रमों, रोग निदान यात्राओं, प्रदर्शनों तथा अन्य विस्तार गतिविधियों के माध्यम से पहुंच बनाई है। विश्वविद्यालय की डिजिटल विस्तार पहलों ने भी इसकी पहुंच को व्यापक बनाया है। विभिन्न फसलों, वैज्ञानिक उत्पादन तकनीकों तथा उभरती कृषि संबंधी समस्याओं पर तैयार तकनीकी वीडियो सोशल मीडिया के विभिन्न प्लेटफार्मों पर लाखों लोगों द्वारा नियमित रूप से देखे जा रहे हैं।
निदेशक अनुसंधान डॉ. देविना वैद्य ने पिछले वर्ष के दौरान विश्वविद्यालय की अनुसंधान उपलब्धियों की जानकारी दी तथा भविष्य के लिए अनुसंधान की प्राथमिकताओं को प्रस्तुत किया। प्रगतिशील किसानों एवं विभागीय अधिकारियों से प्राप्त सुझावों को भी विचार-विमर्श में शामिल किया गया। उन्होंने बताया कि विश्वविद्यालय ने पिछले 10 महीनों में 11.58 करोड़ रुपये की लागत वाले 29 अनुसंधान प्रोजेक्ट हासिल किए हैं। उन्होंने विभिन्न प्रमुख संस्थानों के साथ हुए कई समझौता ज्ञापनों (MoUs) का भी उल्लेख किया, जो शैक्षणिक एवं अनुसंधान सहयोग को और मजबूत करेंगे।
परिषदों की अध्यक्षता करते हुए कुलपति प्रो. बवेजा ने कहा कि विश्वविद्यालय की भविष्य की अनुसंधान एवं विस्तार प्रणाली किसान-केंद्रित, उद्योग की आवश्यकताओं के अनुरूप, डिजिटल रूप से जुड़ी, जलवायु-सक्षम एवं नवाचार-आधारित होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि अनुसंधान को ऐसी तकनीकों एवं समाधानों में परिवर्तित करने पर जोर दिया जाना चाहिए, जिनका सीधा लाभ किसानों और समाज को मिले। उन्होंने कहा कि हमारा उद्देश्य ऐसी व्यवस्था विकसित करना है, जहां किसान की समस्या अनुसंधान की प्राथमिकता बने, अनुसंधान से नवाचार उत्पन्न हो, नवाचार बौद्धिक संपदा में परिवर्तित हो और विकसित तकनीक अंततः किसान एवं समाज तक पहुंचे।
प्रो. बवेजा ने कहा कि जलवायु-सक्षम बागवानी विश्वविद्यालय के प्रमुख अनुसंधान क्षेत्रों में बनी रहेगी। इसके अंतर्गत बदलती जलवायु परिस्थितियों, उभरते कीट एवं रोगों, जलवायु-सक्षम किस्मों एवं रूटस्टॉक्स, जल दक्ष उत्पादन प्रणालियों तथा एवोकाडो, कीवी, बेरीज, नट्स एवं ड्रैगन फ्रूट जैसी उभरती फसलों की वैज्ञानिक संभावनाओं का मूल्यांकन किया जाएगा। किसानों तक समयबद्ध एवं विश्वसनीय वैज्ञानिक जानकारी पहुंचाने के लिए तकनीकी वीडियो, मोबाइल आधारित परामर्श तथा उभरती AI-आधारित निदान प्रणालियों सहित डिजिटल उपकरणों के उपयोग को भी विस्तार गतिविधियों में बढ़ाया जाएगा।
विश्वविद्यालय की राष्ट्रीय एवं वैश्विक अनुसंधान स्थिति को मजबूत करने के लिए उच्च गुणवत्ता वाले शोध प्रकाशनों, citations, पेटेंट, बाह्य वित्त पोषित अनुसंधान, प्रौद्योगिकी हस्तांतरण एवं अंतरराष्ट्रीय सहयोग पर भी विशेष जोर दिया गया। कृषि क्षेत्र में उपयोग होने वाले आदानों के स्वच्छ, सस्ते एवं टिकाऊ विकल्प विकसित करने को भी अनुसंधान की प्राथमिकता के रूप में चिन्हित किया गया।
विचार-विमर्श के दौरान सदस्यों ने फसल विविधीकरण को गति देने, नई किस्मों का मूल्यांकन करने तथा बदलती जलवायु परिस्थितियों एवं किसानों की उभरती आवश्यकताओं के अनुरूप तकनीकों पर अनुसंधान मजबूत करने की आवश्यकता पर जोर दिया। अनुसंधान परिषद ने मांग आधारित एवं बहुविषयक अनुसंधान को बढ़ावा देने की आवश्यकता बताई, जिसमें किसान समस्याओं, वैज्ञानिक अनुसंधान एवं उद्योग की आवश्यकताओं के बीच मजबूत संबंध स्थापित हो।
विस्तार परिषद ने पोस्ट हार्वेस्ट प्रबंधन, खाद्य प्रसंस्करण, मूल्य संवर्धन, जल संरक्षण एवं वन आधारित उद्यमों पर अधिक ध्यान देने की आवश्यकता पर भी जोर दिया। विश्वविद्यालय की बायोचार एवं पाइन ब्रिकेटिंग जैसी पहलों को ‘वेस्ट टू वेल्थ’ तकनीकों पर अनुसंधान एवं विस्तार से और अधिक जोड़ा जाएगा। अनुसंधान परिषद की बैठक में प्रगतिशील किसान सुरेंद्र सिंह मेहता, मनोज नेगी, प्रमोद सिंह पठानिया, डॉ. सुमन रत्तन एवं श्री भूरा सिंह, जबकि विस्तार परिषद की बैठक में श्री लछिया राम एवं श्री राजेश कुमार ने भाग लिया। बैठकों में कृषि विश्वविद्यालय पालमपुर के डॉ. बी.एन. सिन्हा एवं डॉ. एन.डी. नेगी, अतिरिक्त निदेशक कृषि डॉ. नीति सोनी, वन संरक्षक सोलन श्री एन.पी. बरोट, उप निदेशक बागवानी सोलन डॉ. शिवाली ठाकुर एवं डॉ. देवेंद्र अत्री तथा डीएफओ सोलन श्री प्रदीप कुमार चौहान सहित अन्य अधिकारियों एवं विशेषज्ञों ने भाग लिया।










