शिमला: राज्यसभा सांसद एवं भाजपा प्रदेश महामंत्री डॉ. सिकंदर कुमार द्वारा संसद में फास्ट-ट्रैक पॉक्सो अदालतों में एआई (कृत्रिम बुद्धिमत्ता) आधारित विधिक सहायकों के उपयोग को लेकर पूछे गए प्रश्न के जवाब में केंद्र सरकार ने स्पष्ट किया है कि फिलहाल ऐसे उपकरणों का उपयोग विशेष रूप से पॉक्सो अदालतों में नहीं किया जा रहा है।
विधि एवं न्याय मंत्रालय में राज्य मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने बताया कि ई-कोर्ट्स मिशन मोड परियोजना (चरण-3) के तहत एआई सहित उभरती तकनीकों के एकीकरण के लिए 53.57 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है।
उन्होंने कहा कि विधिक अनुसंधान विश्लेषण सहायक (LeRAA) तथा डिजिटल कोर्ट 2.1 जैसे एआई आधारित प्लेटफॉर्म वर्तमान में पायलट परीक्षण के चरण में हैं। इनका उद्देश्य न्यायाधीशों को विधिक अनुसंधान, दस्तावेज विश्लेषण और डिजिटल वाद प्रबंधन में सहायता देना है। वहीं SUPACE का वर्तमान में उपयोग नहीं किया जा रहा है।
सरकार ने यह भी स्पष्ट किया कि ये पायलट परियोजनाएं विशेष रूप से फास्ट-ट्रैक पॉक्सो अदालतों के लिए नहीं हैं, इसलिए इनके माध्यम से मामलों के निपटान में समय या संरचनात्मक विलंब में आई कमी का कोई राज्यवार आंकड़ा उपलब्ध नहीं है।
केंद्रीय राज्य मंत्री ने कहा कि एआई आधारित समाधानों के उपयोग और उनके भविष्य के संचालन से संबंधित दिशा-निर्देश एवं सुरक्षा व्यवस्था भारत के उच्चतम न्यायालय और संबंधित उच्च न्यायालयों की नीतियों एवं नियमों के अनुरूप तय की जाएगी। सरकार ने यह भी स्पष्ट किया कि एआई का उद्देश्य केवल विधिक अनुसंधान और न्यायिक कार्य में सहायता देना है, न कि न्यायाधीशों के स्वतंत्र निर्णय में हस्तक्षेप करना।








